23 मार्च 2026

मारिया रिल्के, गुलाब और गांव रारोन.

रेनर मारिया रिल्के लिखते हैं जब कि

"अपने हृदय की हर उस बात के प्रति धैर्य रखें जो अभी अनसुलझी है। उन अनकहे सवालों से ही प्रेम करने की कोशिश करें, ठीक वैसे ही जैसे वे कोई 'बंद कमरे' हों या किसी 'विदेशी भाषा' में लिखी गई रहस्यमयी किताबें।
अभी जवाबों की तलाश न करें। वे आपको अभी मिल भी नहीं सकते, क्योंकि अभी आप उन्हें 'जी' नहीं पाएंगे। और असल बात तो सब कुछ जीने की ही है।इस वक्त, आप बस उन सवालों को जीएं। शायद भविष्य के किसी अनजाने दिन, आपको पता भी न चले और आप धीरे-धीरे खुद को उन जवाबों के भीतर सांस लेते हुए पाएंगे।"

तो रेनर मारिया रिल्के (1875–1926) केवल एक कवि नहीं, बल्कि आधुनिक साहित्य के सबसे रहस्यमयी और प्रभावशाली दार्शनिकों में से एक थे। इनकी माँ ने अपनी एक बेटी को खो दिया था। उस दुख में उन्होंने रिल्के के बचपन के शुरुआती पांच वर्षों तक उन्हें एक लड़की की तरह पाला। उन्हें लड़कियों के कपड़े पहनाए जाते थे।

रिल्के का मानना था कि सच्ची रचनात्मकता केवल 'एकांत' (Solitude) में ही जन्म ले सकती है। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन अकेले यात्रा करते हुए या मित्रों के महलों और किलों में रहकर बिताया। 
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ज्ञान केवल शब्दों में नहीं होता, कुछ सच्चाइयाँ केवल अनुभव के माध्यम से ही समझ आती हैं। नहीं ? हमारे आपके मानने से क्या होता है ? मेरे मानने से लेकिन सबकुछ होता है। मेरी दुनिया में मेरा सबकुछ है, मेरे ईश्वर भी।

नवम्बर 2020 में लिखी हुई मेरी एक कविता जैसा कुछ मिला ट्विटर पर.. पढ़ना चाहेंगे.. नहीं ? Hehe.. नहीं पढ़ने का ऑप्शन है आपके पास ?


कविता में 'कविता' उतनी ही रहे
उदास लड़की में खिलखिलाने की संभावना उतनी ही रहे
जीवन से मायूसी उतनी ही दूर रहे
सिरहाने से किसी पसंदीदा किताब की वफ़ा उतनी ही रहे
ख़रगोश में बिल्ली से और बिल्ली में कुत्ते से बच जाने की हुनर उतनी ही रहे..
..जितनी कि सर्दियों की चाय में अदरक रहती है।
फिजिकल मैप में नीले रंग की ज़रूरत
रसोई में खिड़की की ज़रूरत
गर्मी में शाम और सर्दी में दोपहर की ज़रूरत
उदास तन्हा खाली आसमान में चाँद की ज़रूरत
दिल्ली में चाँदनी चौक की ज़रूरत
अफ़्रीका में टिम्बकटू की ज़रूरत..
...जितने ज़रूरी मसले ही जीवन की आपाधापी में खो जाते हैं!
दो लड़कियाँ झाँकती हैं परदे के किनारे से
सड़क के उस पार जाते नौजवान लड़के को जैसे
जैसे मंदिर के जलते दिए की लौ देखते हुए
बच्चे की कान में मस्जिद से उठती अजान की आवाज समा जाती है
जैसे माँ में बची रहती है 'माँ', चाहूँगा मैं भी 
कि तुम्हारी हँसी में भी उतना ही 'तुम्हारापन' बचा रहे
एक लड़की जब मिली मुझसे तो वो लड़ रही थी अपने स्वप्नों के लिए
जबकि 29 साल की उम्र में लड़कियाँ क्या करती हैं किसे नहीं पता ?
तब जाना मैंने कि दुनिया में कुछ चीज़ें बहुत पवित्र होती हैं
मसलन नदियों का बहना, फूलों का खिलना, हवा का चलना
चाय का कप में जा टिकना और स्वप्न के लिए लड़ना.
पिता जब मुझे टाफियाँ देते थे और बहुत सोचकर कुछ पैसे भी
तब माँ ओझल होकर देख रही होती थीं
पिता की आँख में उमड़ आए संकोच भरे प्यार को.
"तुमने ही बिगाड़ा है इसे" की जब उलाहना देते हुए
पिता, पृथ्वी रूपी माँ के लिए गर्मी के सूरज जैसा बनें तब
मुझे स्वाद मिला उन टाफियों के

हम्ममम...

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तो
रेनर मारिया रिल्के हैरानी की बात यह है कि दुनिया को जीवन जीने का तरीका सिखाने वाले का अपना कोई स्थायी घर नहीं था। वे पूरी ज़िंदगी एक बंजारे की तरह रहे। वे यूरोप के अलग-अलग शहरों-पेरिस, म्यूनिख, वेनिस और स्विट्जरलैंड के किलों में अतिथि बनकर रहे।

रिल्के की मृत्यु की कहानी भी उनकी कविताओं जैसी ही अजीब और दुखद है। कहा जाता है कि एक बार एक महिला मित्र के लिए गुलाब चुनते समय उनके हाथ में एक काँटा चुभ गया। उस मामूली घाव से उन्हें संक्रमण हो गया, जो बाद में 'ल्यूकेमिया' के रूप में सामने आया और उनकी मृत्यु का कारण बना। उनके चाहने वाले कहते हैं कि रिल्के को उनके पसंदीदा फूल 'गुलाब' ने ही ले लिया।

अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने ख़ुद अपनी समाधि के लिए ये पंक्तियाँ लिखी थीं, जो आज भी उनकी कब्र पर पर लिखी हुई है-

Rose, oh reiner Widerspruch, Lust, Niemandes Schlaf zu sein unter so viel Lidern.
(गुलाब, ओ शुद्ध अंतर्विरोध, इतनी सारी पलकों के नीचे किसी की नींद न होने का आनंद।)


हम्ममम....
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गर्मी आ गई है तो मेरा ज़्यादातर महीने गंजा रहना तय है। कुछ दिन पहले ही गंजा होने का सोचा था, किसी ने मना किया तो मान गया.. फिर भी मन में था कि नहीं नहीं Mantuuu गंजा हो जा.. कोई और क्या कह रहा इससे तुझे क्या मतलब ?
कल बाल कटवाने गया तब तक डिसाइड नहीं था कि गंजा होना है या बाल कटवाना है.

कुर्सी पर बैठे बैठे कानों तक टीवी पर चल रही फ़िल्म की आवाज़ आई, अल्लू अर्जुन-पूजा हेगड़े की कोई फ़िल्म चल रही थी, पिता बोलता है कि कुछ रिश्ते किराए के मकान जैसे होते आप कितना भी सजा के रखो उसे, एकदिन आयेगा जब उसे खाली करना होगा.

तो मैंने सोचा कि Mantuuuye गंजा मत हो.. ऐसे ही दौड़ दौड़ के इतना पतला कर लिया है ख़ुद को कि दिन भर में 2-3 लोग टोक दे रहे कि तबियत ख़राब हो गई थी क्या। गंजे सिर में तू 15 से भी कम का लगेगा..मत हो और बारिश हुई है ठंड बढ़ी है.. सर पर फसल रहने दे.. ये सब ख़ुद को मनाया जा रहा था कि गंजा होना या ना होना तेरा ही फैसला है किसी के कहने से तू रुक नहीं गया है 🫣



मेरे लिए दुनिया का सबसे वाहियात काम बाल कटवाना है और 
मेरे मन का न होने पर किसी और कहा मानना
पर इस बार मेरा ही मन हुआ कि गंजा होना टाल मंटू..
अब क्या पता मेरा मन हुआ या मेरा मन बनाया गया.. जो भी.


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तो रेनर मारिया रिल्के साब ये बताओ कि

शुरू के 5 साल लड़की बन के बिताए इसका असर तुम्हारे बाकी के 46 साल के जीवन पर कितना पड़ा ? कैसे पड़ा ? क्यों पड़ा ? पड़ा या तुमने पड़ने दिया ?

इसका जवाब शायद न मिले पर इनके कब्र पर जाना होगा एक बार..
वही वही वही... कहां ? स्विट्जरलैंड के वैलिस कैंटन में स्थित रारोन नामक एक छोटे से गांव में जाना होगा Mantuuu. Ok. चले जाएंगे, कोई बड़ी बात नहीं है ये.

   

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🙂.

15 फ़रवरी 2026

O'Romeo झूमियों !

देखिए भई, मेरे पसंदीदा निर्देशकों में विशाल भारद्वाज शामिल हैं तो उनकी फ़िल्मों में रह गई कमियों पर ध्यान न जाना बहुत हद तक लाज़िमी है। पूर्वाग्रही (prejudice) माइंड ऐसे ही काम करता है। तो तो कहना यही है कि तभी आगे पढ़िए/देखिए.. नहीं तो और करने को कितना कुछ काम होगा ही जीवन में आपके, वो कीजिए :)


तो पहली बात तो मोतिहारी शहर की कर लेते हैं। कि छोटे से शहर में ये फ़िल्म रिलीज कैसे हुई ? मुझे ध्यान है जब 2014 में हैदर फिल्म (विशाल भारद्वाज की अबतक की सबसे पसंदीदा मेरी फ़िल्म) आई थी तब मैंने सोचा था कि इसे देखने मुज़फ्फरपुर (यहां से 80km दूर) चला जाऊँ, नहीं जा पाया और अफ़सोस अब तक है कि हैदर जैसी फ़िल्म थिएटर में न देख पाया, ख़ैर।

संजय कॉम्प्लेक्स, पिछले कुछ साल पहले ही ओपन हुआ है और पहली फ़िल्म मैंने इसमें जवान देखी थी। और अंदर बाहर से देखकर लगता ही नहीं कि मोतिहारी शहर में ऐसा कुछ एक्जिस्ट कर सकता है वो भी तब जब ज़्यादा  पैसे के टिकट न लगते हों। पर अच्छी बात है। है ये यहां और ठीक है, हम जैसे फ़िल्मी कीड़ों के लिए। डॉल्बी एटमॉस साउंड सिस्टम है भाई और क्या चाहिए ?

                            

अब तक इसमें जवान, आर्टिकल 370, कांतारा 2, तेरे इश्क़ में, धुरंधर और अब ओ रोमियो देख चुका हूँ।
          

         


        

मैं हूँ.. शाम को ऐसे दिखा.... haha और दोपहर में ऐसे- 

         


       


      

           

फ़िल्म पर क्या ही बात करें, अच्छी है फ़िल्म... समय है, मूड कर रहा तो देख आइए।

सिनेमेटोग्राफी अच्छी है, जो कि विशाल भारद्वाज की फ़िल्मों में होती है। 

एक चीज़ जो खटकी कि सुपारी देकर मरवाने वाले पेशे में मारने वाला इंसान इतना अंदर घुस नहीं जाता टारगेट के और इतनी हिंसा केवल दिखाने के लिए दिखाई गई है। मारने वाला चुपके से मार के जान हथेली पर रख पतली गली से निकल लेता है, ढिंढोरा नहीं पीटता लेकिन वही ना, फ़िल्म है भई।

कुछ सीन्स वाक़ई अच्छे उतर आए हैं पर्दे पर। जब तृप्ति डिमरी रात में नाव पर बैठी तेरे ही लिए गुनगुनाती है या फ़िर क्लाइमेक्स से पहले शाहिद और तृप्ति का साथ में लिपटकर गन शॉट वाला सीन।

और पान की दुकान गाने की शुरुआत भी

और आशिक़ बने शाहिद के सामने जब एक मोहतरमा उन्हें प्लीज करने की कोशिश करती है तब शाहिद का ज़ोर ज़ोर से रो देने वाला सीन.

अविनाश तिवारी के कैरेक्टर को स्पेन में ही रखा है, उसे इंडिया लाया जाता तो फ़िल्म आधे घंटे और खींच जाती। तब उस केस में सीट के पीछे बैठा एक बंदा गरिया ही देता फ़िल्म बनाने वाले को। इरफ़ान साहब होते तो शायद विशाल उन्हें ये अविनाश वाला रोल देते उन्हें। 

"इश्क़ का फीवर" गाने में तृप्ति और शाहिद के चेहरे का क्लोजअप शॉट 💕

जिस मैसेज को देने के लिए तमन्ना भाटिया जी फ़िल्म में हैं, वो मक़सद अच्छे से पूरा हुआ है। ज़्यादातर बारी अमूर्त बातें, कमर्शियल सिनेमा के लिए नहीं होती हैं। विशाल भारद्वाज ये चीज़ समझते होंगे पर अपनी फ़िल्म में इससे बचते हुए दिखते नहीं हैं। अब यहां ये मुद्दा उठ सकता है कि फ़िल्म को निर्देशक अपने मन के लिए बना रहा है या दर्शकों के लिए ? अपने मन के लिए बना रहा है तब तो वो कुछ भी बनाए, दिखाए, फ़िर उसे ये उम्मीद छोड़ देनी होगी कि वीकेंड पर कितनी कमाई हुई और कितने करोड़ के क्लब में शामिल हुई या नहीं।

            
          


           
इंटरवल हो गया है। फर्स्ट हाफ ok ok है। 


अब जो चीज़ मुझे जमी फ़िल्म में उसपर आते हैं.. 
ये दोनों शॉट देखिए
                
                

ये काठमांडू का दृश्य है। और लगा जैसे कि अभी मैं थियेटर से निकलूं और चल दूं काठमांडू घूमने 😆

कुल मिलाकर- विशाल भारद्वाज के फिल्मोग्राफी और संगीत के मुरीद हैं तो देखी जा सकती है फ़िल्म। शाहिद और तृप्ति डिमरी साथ में अच्छे लग रहे। ...और 'पान की दुकान' गाने में दिशा पटानी भी जँच रहीं। सेकंड हाफ ज़्यादा अच्छा है। सारे गाने सुनने लायक हैं।

गुलज़ार साब, विशाल भारद्वाज की जोड़ी के लिए 🫡

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hmmmmmm..🐢।             14 फ़रवरी 2026 🫂

...दीवाने मोहब्बत के हैं जो है उनको पहला सलाम !

😊


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27 जनवरी 2026

15 मिनट

[अक्टूबर 2020, दिल्ली]

अच्छा सुनो!

सर्दियाँ आ रही, नियम से रोज़ 15 मिनट धूप में बैठना

किशोर कुमार के गाने सुनना शुरू करना और पापोन के किसी गाने को ख़त्म करके ही उठना..या गाना नहीं तो कम से कम अपने प्रिय कवि/कवयित्री की कोई एक कविता बोल के पढ़ना, उसे याद कर लेना

...याद से याद आया, मुझे भूलना नहीं 🙈

और हाँ, मेरे जित्ता ट्विटर न करना नाही फोटू खचैक करना... रोना तो बिल्कुल नहीं। नहीं तो रोना आए तो याद करना कैसे तुम्हें घुमा के पीठ पर मैं मुक्के जड़ता था..हालाँकि तुम घूमी भी नहीं कभी..हाँ पर रोना नहीं

और और और जो गिनती के गाने मैंने बातए उन्हें तो कभी न सुनना, सपने में भी नहीं

बच्चों को देखकर ऐसे मुस्कुराना कि उन्हें पुरज़ोर यक़ीन हो जाए कि दुनिया बहुत ही ज़्यादा ख़ूबसूरत है। भाई का ध्यान रखना, उसकी चाय झूठी ना करना। भाई को अकेले कभी कभार ही छोड़ना..

मंदिर.. हाँ मंदिर चले जाना रोज़ नहीं तो गैप करके। ख़ूब पढ़ना और हो सके तो कॉफ़ी कम करके चाय पीना

तुम्हारे बताए गाने, फ़िल्म, किताब, जगहें भला मैं कैसे भूलूँगा, भूलने की हर कोशिश कामयाब नहीं होती और तुम, तुमसे जुड़ी हर एक बात हर एक पहलू शिद्दत से याद आने लगते हैं और एक बात बताऊँ, मैं इन सबको भूलना भी नहीं चाहता 🙈

तुम ऐसे गुज़री हो जैसे बर्फ़ की सिल्ली से हवा गुज़र के किसी बुखार से ग्रस्त रोगी के ज़हन से छू गई हो। तुम उतना ही ठहर गई हो मुझमें जितना गंगा के पानी में पहाड़ी औषधीय पौधों के गुण, तुम मेरे उतनी ही क़रीब हो गई हो जितना कि उत्तर दिशा से ध्रुव तारा। 

पर सबसे अच्छी बात ये हुई कि

..कि तुम मुझमें आई भी ठहरी भी और शायद जा भी चुकी हो पर मेरा वजूद ज्यों का त्यों हैं। और क्या चाहिए एक दीवाने को। तुम्हारे आने के पहले और अब तुम्हारी अनुपस्थिति के बाद के दोनों 'मैं' में जो अंतर व्याप्त है वो सोचता हूँ तो अलग ही एहसास से भर जाता हूँ, तुम्हारा बस होना ही ❤

हम इसी पीढ़ी के हैं बावजूद हमारा इश्क़(?) सदियों पुराना वाला। और इस एक बात पर यक़ीन करके हम दोनों ने ही दोनों का बहुत भला किया है। नहीं तो आज के इश्क़ का अंज़ाम रुका हुआ पंखा, तेज़ भागती बसें/रेलगाड़ियां और उफ़नती हुई दरिया तय करती हैं।
 
बताया ना, हम ज़रूर इसी पीढ़ी के हैं मगर..

मगर सच्चे लगते हैं ये धरती ये नदियाँ ये रैना और tummmmmmmmmmmmmmmmm ❤ फ़िर गाने में घुस गया मैं 😐 तो मैं कह रहा था कि.. देखो यहाँ भी केवल मैं ही कह रहा हूँ.. तुम्हें कभी मौका नहीं दिया मैंने बोलने को। मैं श्रापित हूँ यार, मेरी कहानियाँ मेरे मौत के साथ ही ख़त्म होगी

और ये मौत की बात हम क्यों करने लगे भला
तुम हर बारी मेरे अगली कहानी के फ़िर से शुरू होने के दरमियान "हाँ ह्म्म्म अच्छा भक्क ठीक है बाबा" कहती रही.. कभी कभी बोलने का मौका दिया पर वो इसलिए कि लिखते-लिखते बोलते-बोलते मैं थक जाता था इसलिए 🙈

7.83 ग्राम दुःख इस बात का है कि तुम जैसी शख़्सियत से जुड़ के, बातें करके भी मेरे से चुप नहीं रहा गया ये जानने के बावजूद कि 'सुनना' सभी कलाओं में सर्वोपरि है शायद! फ़िर भी मैं बड़बड़ाता गया और तुन ध्यान से सुनने में और माहिर हो गई। इसके लिए शुक्र अदा करना मेरा, जहाँ भी होना :)

चलो हो गए मेरे धूप में 15 मिनट :)

'लेकर हम दीवाना दिल' से शुरू किया था और पापोन का 'ये मोज़ेज़ा(चमत्कार) भी कभी, मोहब्बत दिखाए मुझे, के संग(पत्थर) तुझपे गिरे और जख़्म आए मुझे' गाना ख़त्म हो गया। 

नीचे चलता हूँ अब, पेट भरने का जुगाड़ करता हूँ :)


:)

श्राप


[जनवरी 2021, दिल्ली]

प्रिय _______!

कहाँ हो तुम ? ठीक हो ना... ये तो फॉर्मेलिटी है। ऊपरी तौर पर व्यक्त की गई मेरी खोखली चिंता। तुम जहाँ भी हो जैसी हो उस परिस्थिति को झेलो.. उसमें फँसने में तुमने भी तो कभी दिलचस्पी दिखाई थी, नहीं ? तो मन ख़ुश नहीं रहता होगा तो भी ख़ुद को धोखे में रखो और ख़ुश दिखो

तुम तुम हो मैं मैं हूँ। 20वीं सदी में हमें दुनिया के तमाम लोगों को छोड़कर एक दूजे से ही मोहब्बत हुई। हुई क्या ? तुम्हारा तुम जानो, मेरा मैं जानता हूँ। पता है ? मेरी जो चीज़ें पूरी तरह खो चुकी हैं, ये वे चीज़ें हैं जिन्हें मैंने जब खोया तो वे किसी और को मिली भी नहीं थीं..

गुज़र रहे लम्हों की तस्वीर आगे जाकर पीछे देखने पर ज़्यादा स्पष्ट दिखाई देती हैं। तो देखो, याद करो.. हमने प्यार ही किया था क्या ? मैं कविता-कहानी के लिए कच्चे माल की तलाश में था तुम अपने पहले प्रेम को भूल जाने के भरसक प्रयास में थी। तुम अपने पहले प्रेमी को भूल नहीं पाई इसलिए मुझे

ढेर सारा कच्चा माल मिल गया। तुम पर पहले प्रेम की बातें, छुअन, मलाल ये सब हावी नहीं होता तो मैं भी प्यार कर लेता, कच्चा माल कहीं और ढूंढ़ता। पर सबकुछ का तय है ना.. हम कुछ नहीं करते हैं.. हमें आगे जाकर चाय पीते हुए, सूरज को डूबते हुए, मन्नू भंडारी की कहानी पढ़ते हुए पीछे देखते हैं

और मैं मुस्कुराता हूँ कि मैं सफ़ल रहा तुम असफ़ल। पर तुम्हें भूलना क्यों नहीं आता है ? माना पहला प्रेम क़तई भूलने की चीज़ नहीं मगर मन के गहरे अतल में तो छुपा ही सकती हो, ये हुनर सीखो.. नहीं तो तुम्हारा अंत शायद अख़बार के तीसरे पन्ने के किसी कोने में छपी उस ख़बर में

ख़बर में हो जिसे कोई नहीं पढ़ता। यही सच्चाई है। हम सच नहीं स्वीकार करते और चमत्कार होने की उम्मीद लिये ऐसी लड़ाई में कूद जाते हैं जहाँ हार तय है। हार मान लेना हर बार डरपोक होने की कसौटी नहीं होती, पागल लड़की!

पता है ? अगर हम 15 मिनट बिना हिले-डुले बैठे या लेटे रहें तो सो जायेंगे

पढ़ती हो कि नहीं ? पढ़ा करो.. जब किसी और का सुख पढ़ोगी तो दुनिया पर और भरोसा कर पाओगी, उस दुनिया पर जिसमें मेरे जैसे लोग नहीं रहते। किसी का दुःख पढ़ोगी तो तुम्हारा दुःख कम प्रतीत होगा। पढ़ा करो.. व्यस्त रखो ख़ुद को... जो बेड़ियाँ हमें बहुत कसकर जकड़ती है ना ये वहीं बेड़ियाँ हैं

जिन्हें हमने कभी तोड़ दिया होता है। निराशा लाज़मी है। इसे स्वीकार करो। लाज़मी से याद आया आज कैफ़ी आज़मी साब का जन्मदिन भी है। इनके बारे में जानो, इनकी 'औरत' नज़्म पढ़ो। आज सकरात भी है। हमारे इधर 'खिचड़ी' कहते हैं इसे। आज सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश कर जायेंगे, सब अच्छा होगा अब

सब अच्छा होना चाहिए... मेरे पास शब्दों में देने लायक ही उम्मीद है कि अपने दुर्भाग्य के बारे में कभी निरीहता से मत देखो, क्योंकि तुम्हारे दुर्भाग्य के लिए थोड़े-थोड़े से सभी ज़िम्मेदार हैं।

चलो अब ख़त्म करता हूँ, ख़ुश रहो और मुझे थोड़ा-थोड़ा भूलती रहो

चाय ठंडी हो रही है। प्लूटो को भी चाय पीनी है मगर उसे देता नहीं हूँ तबतक जबतक कि उसकी इंतज़ार और व्याकुलता से भरी आँखों को देखकर मुझे किसी कविता-कहानी के लिए कोई कच्चा माल न मिल जाए। आज दिल्ली में घना कुहरा है, आज मुझे बहुत कुछ पढ़ना भी है, बहुत सारी फ़िल्में भी देखनी है :)


:)

5 जनवरी 2026

चार जनवरी

 
              

                                     
               

                   
               

                     
               

                     
               

                   
               

                     
               

                                           
                


                   
               


चार जनवरी

मेरी उपस्थिति से
ऊबने वाली चीज़ों के पास विकल्प का अभाव
मुझे गुमान में रखती है कि मैं अच्छा कर रहा हूं- 
फ़िल्में देखता हूं
रोटी बना लेता हूं
पढ़ता हूं
जूते ढीले बांधता हूं
धूप में बैठकर मां के बारे में सोचता हूं
समय से सोकर, समय से उठता हूं
बोलने के क्रम में 
सोचने तक की सब्र से ख़ुद को भरना चाहता हूं
क्योंकि
फूलों और लोगों की भीड़ से लदी
घूम रही है अब भी धरती।
दुनिया की नज़र में आई मेरी
तमाम अच्छाइयों के बावजूद
मैं जी गया एक साल और
और मेरे प्रतीक्षा न करने पर भी
आने वाले कई और साल
जीता जाऊंगा ऐसे ही.. 
जैसे ठिठुरन के दिनों में चार जनवरी आ जाता है
जैसे फूल खिलते हैं,
जैसे दुनिया भर की माएं दुःख छिपाती हैं
जैसे लोगों की भीड़ बढ़ती है, 
और उनकी अच्छाइयां भी उनके बुराइयों के आसमान तले..

🙂